सरकारी निवेश की ज़मीनी पुष्टि: नौबतपुर में गोरखा बटालियन का स्थायी कैंप

नौबतपुर–फुलवारी–बिहटा कॉरिडोर को लेकर यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि यह क्षेत्र पर्यावरणीय कारणों से विकास योग्य नहीं है। लेकिन हालिया सरकारी फैसले इस दावे को ज़मीनी स्तर पर ही कमजोर कर देते हैं। ताज़ा समाचार के अनुसार, बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस (बीएसएपी) की गोरखा बटालियन का स्थायी कैंप नौबतपुर में स्थापित किया जा रहा है। यह कैंप लगभग 30 एकड़ भूमि में बनेगा और इसके निर्माण पर 40.54 करोड़ रुपये की लागत आएगी।

सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, यह केवल एक अस्थायी ढांचा नहीं होगा, बल्कि इसमें स्थायी भवन, बैरक, परेड मैदान, प्रशिक्षण केंद्र और प्रशासनिक ढाँचा विकसित किया जाएगा। इस कैंप में लगभग 1300 जवानों की तैनाती होगी, जिससे साफ़ होता है कि सरकार नौबतपुर क्षेत्र को केवल सुरक्षित ही नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मान रही है।

यह ज़मीन नौबतपुर मुख्यालय से करीब 6.5 किलोमीटर की दूरी पर, बिहटा–सरमेरा फोरलेन से सटी हुई बताई गई है। यानी वही कॉरिडोर, जहाँ रिंग रोड, एयरपोर्ट, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और अन्य बुनियादी ढाँचे विकसित किए जा रहे हैं। यदि यह क्षेत्र वास्तव में विकास के लिए अनुपयुक्त या पर्यावरणीय रूप से प्रतिबंधित होता, तो यहाँ इतने बड़े पैमाने पर स्थायी सुरक्षा ढाँचा खड़ा करना संभव ही नहीं होता।

गौर करने वाली बात यह भी है कि गोरखा बटालियन का काम केवल सामान्य सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह बल वीवीआईपी सुरक्षा, संवेदनशील क्षेत्रों में अपराध नियंत्रण और नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था संभालने जैसे अहम दायित्व निभाता है। ऐसे में इस कैंप का नौबतपुर में बनना इस क्षेत्र की प्रशासनिक और रणनीतिक स्वीकार्यता को और मज़बूत करता है।

यह उदाहरण एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। जब सरकार स्वयं 30 एकड़ ज़मीन पर स्थायी कैंप, ट्रेनिंग सेंटर और प्रशासनिक भवन बना सकती है, तो फिर उसी क्षेत्र में नियोजित टाउनशिप, उद्योग, अस्पताल या शैक्षणिक संस्थान क्यों नहीं? क्या पर्यावरण संरक्षण के नियम केवल आम नागरिकों और निवेशकों पर लागू होते हैं, जबकि सरकारी परियोजनाओं के लिए वही ज़मीन उपयुक्त मानी जाती है?

दरअसल, यह निर्णय इस बात का स्पष्ट संकेत है कि नौबतपुर क्षेत्र अब केवल ग्रामीण या सीमांत इलाका नहीं रहा। यहाँ सड़क, बिजली, सुरक्षा, प्रशासन और कनेक्टिविटी—सब मौजूद है। गोरखा बटालियन का कैंप इस पूरे कॉरिडोर में विश्वास का प्रतीक है, जो यह बताता है कि सरकार स्वयं इस क्षेत्र को भविष्य की गतिविधियों के लिए तैयार मान रही है।

इसलिए, जब सरकार एक तरफ़ ₹40 करोड़ से अधिक की लागत से सुरक्षा बल का स्थायी कैंप बना रही है और दूसरी तरफ़ हज़ारों करोड़ रुपये का इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश कर चुकी है, तब कंज़र्वेशन ज़ोन के नाम पर विकास को रोकना नीतिगत रूप से असंगत प्रतीत होता है। यह उदाहरण साफ़ करता है कि समस्या ज़मीन की नहीं, बल्कि नीति की व्याख्या की है।

नौबतपुर में गोरखा बटालियन कैंप का निर्माण इस पूरे विमर्श को एक नई मजबूती देता है। यह बताता है कि क्षेत्र विकास के लिए सुरक्षित, उपयुक्त और रणनीतिक रूप से स्वीकार्य है। अब आवश्यकता केवल इतनी है कि सरकार इस स्वीकार्यता को व्यापक विकास नीति में भी प्रतिबिंबित करे, ताकि यह इलाका केवल सुरक्षा केंद्र नहीं, बल्कि रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक गतिविधियों का भी केंद्र बन सके।

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