छोड़ने की समझ — जीवन और रियल एस्टेट दोनों की बुनियाद
(रियल एस्टेट ब्लॉग । प्रमेश कुमार)
पकड़ने का स्वभाव असल में अधिकार से नहीं, असुरक्षा से पैदा होता है। हमें लगता है कि अगर हमने ढील दी, अगर हमने छोड़ा, तो सब कुछ बिगड़ जाएगा।
यही डर हमें अनावश्यक नियंत्रण की ओर धकेलता है—रिश्तों में भी, और निर्णयों में भी।
जबकि सच्चाई यह है कि हर चीज़ को कसकर पकड़ना न तो जीवन को सुरक्षित बनाता है और न ही परिणाम बेहतर करता है।
जीवन तभी सरल होता है जब हम यह विवेक विकसित करते हैं कि—क्या अपनाने योग्य है,
क्या बदलने योग्य है, और क्या छोड़ देना ही सबसे सही निर्णय है।
रियल एस्टेट में भी यही सिद्धांत लागू होता है।
हर डील को ज़बरदस्ती पूरा करना समझदारी नहीं। हर जमीन पर टिके रहना लाभ नहीं देता।
कई बार समय पर पीछे हटना, भविष्य के बड़े नुकसान से बचा लेता है।
परिपक्व व्यक्ति वह नहीं जो हर परिस्थिति पर पकड़ बनाए रखे, बल्कि वह है जो हालात को पढ़ सके, तथ्यों को समझ सके और भावनाओं से ऊपर उठकर निर्णय ले सके।
अपने विवेक पर विश्वास रखें। अपने मूल्यों पर स्थिर रहें। और यह स्वीकार करना सीखें कि
छोड़ना भी एक सक्रिय निर्णय है— कमज़ोरी नहीं, समझदारी का संकेत।
स्वस्थ रहें। मस्त रहें।

